यहूदी मान्यताएं क्या हैं?

आज हम सात अरब से भी अधिक की जनसंख्या वाले फलते-फूलते विश्व में रहते हैं, जहां संपूर्ण लिखित इतिहास में, युद्ध में मृत्यु पहले से कम हुई हैं, निर्धनता कम हुई है और मानव जीवन पहले से लंबा और अधिक स्वस्थ हुआ है। प्रौद्योगिकी और चिकित्सीय क्षेत्र की खोजें व आविष्कार हमें लगातार आगे बढ़ा रहे हैं और साथ-ही-साथ वैश्विक वाणिज्य और संचार भी इसमें अपना योगदान दे रहे हैं।

पर यह प्रगति मानवता की साझी मान्यताओं के कारण ही संभव हुई है। और यह तब तक ही एक अच्छी प्रगति है जब तक हम उन मान्यताओं का पालन करते हैं। हम दवा को मान तभी देते हैं जब हम जीवन को मान देते हैं। वाणिज्य हर व्यक्ति को केवल तभी लाभ पहुंचाता है जब लोग अपना वचन पूरा करते हैं। प्रौद्योगिकी लाभकारी केवल तभी है जब हम उसका उपयोग सभी को अधिक स्वतंत्रता एवं अवसर देने वाले एक अधिक दयालु, अधिक निष्पक्ष विश्व के निर्माण में करें। और वैश्विक संचार केवल तभी मूल्यवान हैं जब हम एक-दूसरे के साथ अपने विचार साझा करना चाहते हों और सहकार्य करना चाहते हों।

बेहतर दुनिया के निर्माण के कार्य में योगदान देने वाली यहूदी मान्यताओं के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:

ईश्वर की समानता में

यह दुनिया कितनी विशाल है, पर फिर भी कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं। कोई भी दो व्यक्ति एक जैसा नहीं सोचते, एक जैसे नहीं दिखते और न ही एक जैसा जीवन जीते हैं। फिर भी यहूदी तोरा में एक मूलरूप से भिन्न घोषणा की गई है: कि प्रत्येक मनुष्य की रचना ईश्वर की समानता में हुई है।

बच्चा हो या बड़ा, पुरुष हो या महिला, अमीर हो या गरीब, सक्षम हो या दिव्यांग, आपकी जनजाति का कोई सदस्य हो या कोई विदेशी - हम में से हर एक में ब्रह्मांड का रचियता सांस लेता है। प्रत्येक मनुष्य, सृष्टिकर्ता की रचना में अपने अनूठे, अप्रतिस्थापनीय ढंग से उस सृष्टिकर्ता का प्रतिनिधि है। जिसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन पवित्र है।

यहूदी संतों ने सिखाया कि: “किसी एक भी प्राणी के प्राण लेना संपूर्ण दुनिया को नष्ट करने के समान है। और किसी एक भी प्राणी के प्राण बचाना संपूर्ण दुनिया को बचाने के समान है।”

हमारे पास मानव जीवन का यही एकमात्र माप है: प्रत्येक मनुष्य संपूर्ण दुनिया के समान मूल्यवान है।

व्यक्ति के अधिकार

एक नगर घेरेबंदी में घिरा है और शत्रु यह घोषणा करता है, “हमें अपने में से एक व्यक्ति दे दो और हम तुम्हें अकेला छोड़ देंगे।”

यहां क्या करना सही है?

यहूदी संतों ने सिखाया कि हमें बहुत से जीवन बचाने के लिए एक निर्दोष जीवन किसी को सौंप देने की अनुमति नहीं है। क्यों? क्योंकि तोरा हमें बहुत से जीवन बचाने के लिए भी एक निर्दोष जीवन हर लेने की अनुमति नहीं देता है।

20वीं सदी के अधिकांश में, दुनिया की शक्तियां संघर्ष में बंद थीं। यह केवल सत्ता या शक्ति संघर्ष नहीं था; यह विचारधाराओं का संघर्ष था।

एक ओर वे थे जो मानते थे कि राज्य हित, व्यक्तियों के हित से ऊपर है। यदि राज्य हित में हो तो किसी भी व्यक्ति से उसका सब कुछ छीना जा सकता था और पूरे के पूरे समुदायों को समूल नष्ट किया जा सकता था।

दूसरी ओर वे थे जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अधिकार, न्याय के अधिकार, संपत्ति के स्वामित्व के अधिकार और कहां व कैसे रहना है यह निर्णय करने के अधिकार में विश्वास रखते थे।

20वीं सदी के प्रयोग ने यह साफ-साफ दिखा दिया है कि तोरा का मार्ग ही वह एकमात्र मार्ग है जिस पर चल कर समाज सतत बना रह सकता है।

सामाजिक न्याय

यहूदियों के पिता इब्राहीम का न्याय में इतना शक्तिशाली विश्वास था कि उन्होंने इस पर ईश्वर की भी आलोचना कर दी थी। ईश्वर ने उन्हें बताया कि वे सोदोम और गोमोरा के पापी नगरों को नष्ट करने जा रहे हैं। इब्राहीम ने तर्क रखा, “यदि उन नगरों में कुछ नेक लोग भी हुए तो? क्या आपको उन नेक लोगों के लिए उन नगरों को बचाना नहीं चाहिए? क्या संपूर्ण पृथ्वी का न्यायाधीश न्याय नहीं करेगा?”

न्याय वास्तव में ईश्वर का कार्य है। उसने दुनिया की रचना की है और यह दुनिया उचित ढंग से चले यह सुनिश्चित करना ईश्वर पर ही निर्भर है। और इसलिए यह बड़े ही सौभाग्य की बात है कि उसने इस दिव्य और अतिमहत्वपूर्ण कार्य में हमें अपना साथी बनाया है।

"तुम न्याय और केवल न्याय का ही अनुसरण करोगे!" तोरा में ईश्वर हमें आदेश देता है। और जैसा कि यहूदी संतों ने सिखाया है, “दुनिया तीन चीजों के कारण ही कायम है: न्याय, सत्य और शांति।”

यहूदी के लिए, न्याय के पथ पर चलना ईश्वर प्राप्ति के पथ पर चलना है। यहूदी केलेंडर के सबसे पवित्र दिन, योम किप्पूर की सुबह यहूदी, पैगंबर यशायाह की शिक्षाओं में से पढ़ते हैं कि ईश्वर ने उनके लिए क्या आवश्यक किया है: “मनुष्यों को अनुचित ढंग से बांधने वाले सभी बंधनों को खोल देना, पीड़ितों को मुक्त करना, दासता की हर जंजीर को तोड़ देना। भूखों के साथ अपनी रोटी साझा करना; बेघरों को अपने घर में लाना। नंगों को देखो तो उन्हें कपड़े पहनाना, जरूरतमंदों से मुंह न फेरना।”

दुनिया को बेहतर बनाना

क्या मनुष्य दुनिया को बेहतर स्थान बना सकते हैं?

इतिहास के अधिकांश में, बुद्धिमान व्यक्ति इस धारणा पर हंसते थे। बहुत से लोग इस दुनिया को अंधकारमय, शापित स्थान मानते थे। किसी ने यह नहीं सोचा था कि हम स्थायी और दीर्घकालिक परिवर्तन कर सकते हैं। उनका कहना था कि हर चीज चक्र में चलती है। कभी अच्छी चीजें प्रभावी हो जाती हैं तो कभी बुरी।

पर यहूदियों के तोरा में संपूर्ण समय को एक कहानी के रूप में देखा गया है जो इस पृथ्वी पर शांति व बुद्धिमत्ता के दौर की ओर बढ़ रही है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह दुनिया को उस स्थिति से बेहतर स्थिति में छोड़ कर जाए जो उसे मिली थी। हम सभी हमारे कार्यों में, आने वाली दुनिया के निर्माता हैं।

यहूदी इस विचार को तिक्कून कहते हैं, जिसका अर्थ है दुनिया को बेहतर बनाना - सृष्टिकर्ता के बनाए दुनिया से भी बेहतर।

ईश्वर ने प्रेम के कारण यह दुनिया बनाई थी। वह इस दुनिया से प्रेम करता है और वह अपनी सभी रचनाओं को प्रेम से संधारित करता है। और वह प्रेम का जो सबसे महान उपहार हमें दे सकता है वह है दुनिया को बेहतर बना कर और उसमें सामंजस्य स्थापित करके, दुनिया के निर्माण में उसका साथ देना।

इसराइल देश

इसराइल यहूदियों की भूमि है। ईश्वर ने इसे एक चिरस्थायी विरासत के रूप में वचन में दिया था। सभी ईसाई और मुसलमान जिन पुस्तकों को पवित्र मानती हैं वे इस बिंदु पर आकर एकमत हैं।

पर साथ ही ईश्वर ने यहूदियों को यह भी कहा कि उन्हें अपने बीच मौजूद अजनबियों का भी सम्मान करना है। यदि वह व्यक्ति उनके अनुष्ठानों का पालन नहीं करता और उनके कबीले का सदस्य नहीं है तो भी उस अजनबी से गरिमापूर्ण व्यवहार करना चाहिए और यहूदियों तथा गैर-यहूदियों दोनों पर, सभी मनुष्यों के लिए अनिवार्य किए गए बुनियादी नियम-कायदों के पालन की जिम्मेदारी है।

16वीं सदी में यूरोप धार्मिक असहिष्णुता के युद्धों के कारण छिन्न-भिन्न हो गया था। लोग सोचते थे कि जो उनके विश्वास या मत से असहमत है वह विधर्मी है और उसका या तो धर्म-परिवर्तित करना चाहिए अन्यथा उसे मार डालना चाहिए। जब उन्होंने फिर से तोरा - हिब्रू बाइबल - का रुख किया तब उन्होंने पाया कि यह सही मार्ग नहीं है। ईश्वर हमसे चाहता है कि हम एक-दूसरे के साथ शांति से रहें, और यह तभी संभव है जब हम एक-दूसरे की भिन्नताओं को स्वीकार करें।

यहूदियों में भी हमेशा से कई भिन्न मत रहे हैं। यहूदी महत्वपूर्ण मुद्दों पर वाद-विवाद करना पसंद करते हैं। वे अपने लंबे अनुभव से जानते हैं कि केवल विभिन्न प्रकार के मतों और जीवंत बहस के जरिए ही हम सत्य की खोज कर सकते हैं। वस्तुतः तलमूद जो (बाइबल के साथ) सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला यहूदी ग्रंथ है तथा यहूदी नियम-कायदों की नींव है, वह संतों के तर्क-वितर्कों का संकलन है।

लोगों को अपने देश के कानून का पालन करना चाहिए और यह स्वीकार करना चाहिए कि एक अंतिम सत्ता है, जो संपूर्ण दुनिया की रचयिता है। पर हर किसी को समान बनने के लिए विवश करना, विविधतापूर्ण और सुंदर दुनिया की ईश्वरीय योजना के विरुद्ध है।

एकेश्वरवाद

लोग एक ईश्वर को मानें या बहुत से ईश्वरों को या किसी को भी नहीं, क्या फर्क पड़ता है? क्या हम एक-दूसरे के साथ शांति से रहने के लिए मानवीय विवेक और सहजवृत्ति के मार्गदर्शन पर निर्भर नहीं कर सकते हैं?

इतिहास इस प्रश्न का उत्तर एक गूंजते हुए “नहीं” में देता है।

ऐसा 20वीं सदी के बाद विशेष रूप से है, जिसमें पृथ्वी के सबसे शिक्षित राष्ट्र, जिसे विज्ञान, संस्कृति, दर्शनशास्त्र और नैतिकशास्त्र में अपनी उपलब्धियों पर गर्व था, उसने मानवता के विरुद्ध सबसे भयानक अपराध किए थे। उन्होंने ऐसा नासमझी या बदला लेने की भावना का कोई दौरा पड़ने पर नहीं किया, बल्कि उस तर्काधार के साथ किया जिसे वे शुद्ध विज्ञान मानते थे। लाखों-करोड़ों निर्दोष लोगों को काम करा-करा कर या जहरीली गैस द्वारा केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्हें कमतर माना जाता था।

मानव की प्रकृति और बुद्धि सहज रूप से दुष्ट नहीं हैं। मनुष्य प्राकृतिक रूप से एक-दूसरे की देखभाल करते हैं और अन्याय से नाराज हो जाते हैं। मानव बुद्धि ने समझदारी की दौलत उत्पन्न की है।

पर मानव मस्तिष्क आसानी से रिश्वतखोर बनाया जा सकता है। जब नैतिकता असुविधाजनक हो जाती है तो हम उसे खारिज करने के तरीके ढूंढने लगते हैं। जब नैतिकता हमारे रास्ते में आती है, तो हम खेल के नियम बदलने के कारण ढूंढने लगते हैं। और जब बात हमारे कुनबे, कबीले या समाज से बाहर के लोगों की हो, तो हम बस यह मान लेते हैं कि वे हमारी तरह इंसान नहीं हैं और फिर हर कार्य उचित सिद्ध हो जाता है।

यही कारण है कि यह, विशेष रूप से आज के वैश्विक समाज में, बहुत ही महत्वपूर्ण है कि हम एक ऐसी एक सत्ता स्वीकार कर लें जो न तो मनुष्य है और न ही मनुष्यों द्वारा निर्वाचित है और जिसका कहा हर शब्द शाश्वत और अपरिवर्तनीय है।

विश्व शांति

क्या शांति युद्ध से बेहतर है?

यह विश्वास करना कठिन है पर अधिक समय नहीं गुजरा जब लोग युद्ध को एक महान कार्य मानते थे। यह पुरुषों द्वारा अपना सामर्थ्य और राष्ट्रों द्वारा अपनी शक्ति दर्शाने का एक तरीका था। युद्धों का विरोध करने वाले लोगों को सामान्यतः मूर्ख माना जाता था।

पर 2,600 वर्ष से भी पहले, यहूदी पैगंबरों यशायाह और मिका ने ऐसे समय की भविष्यवाणी कर दी थी जब राष्ट्र कभी युद्ध नहीं करने का विकल्प चुन लेंगे और पूरी दुनिया में शांति हो जाएगी।

वस्तुतः यहूदियों के लिए शालोम, अर्थात शांति, एक शब्द मात्र नहीं है। यह ईश्वर का नाम है।

पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय लोगों ने यह समझना शुरू किया था कि मानवता के लिए प्रौद्योगिकीय अस्त्रों के अपने विशाल, नए जखीरे के साथ अब और युद्ध झेले नहीं जा सकते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद विश्व के राष्ट्रों ने एक विशाल संरचना - संयुक्त राष्ट्र - का गठन किया जहां वे बैठ कर युद्ध की बजाए शांति पर चर्चा करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय भवन की एक दीवार पर यशायाह और मिका के शब्द उकेरे गए हैं: “वे अपनी तलवारों से हल का दाँत और अपने भालों से पेड़-पौधों की छंटाई के औजार बना लेंगे; राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध तलवार नहीं उठाएंगे और न ही वे फिर कभी युद्ध करना सीखेंगे।”

ईश्वर करे वह समय बहुत जल्द आए, हमारी कल्पना से भी पहले।