यहूदी इब्राहीम, इसहाक और याकूब की संतानें हैं। वे 3,300 से भी अधिक वर्ष पहले ईश्वर के साथ एक करार के माध्यम से एक कौम बन गए थे।
इब्राहीम ने दुनिया के सामने सबसे पहले यह घोषणा की कि ईश्वर केवल एक ही है। उनका विश्वास एक ऐसे ईश्वर में था जो सर्वव्यापी है पर फिर भी सभी वस्तुओं से परे है। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर अपनी दुनिया में न्याय और दया चाहता है और लोगों को उनके कर्मों के लिए जवाबदेह ठहराता है।
इब्राहीम को अपनी आस्था का प्रचार-प्रसार करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा और अपने जीवन को जोख़िम में डालना पड़ा। उनके पुत्र इसहाक ने उनके मार्ग का अनुसरण किया और इसहाक के मार्ग का अनुसरण किया उनके पुत्र याकूब ने, जिन्हें ईश्वर ने इसराइल नाम दिया। और उनको यह वचन दिया गया था कि उनकी संतानों को कनान की भूमि दी जाएगी जिसे आज इसराइल देश के नाम से जाना जाता है। वे अपने पूर्वजों के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए चुने गए व्यक्ति होंगे।
याकूब और उनकी संतानों को एक अकाल के कारण कनान छोड़ कर मिस्र जाना पड़ा। वहां उनके वंशजों को ग़ुलाम बना लिया गया। कई वर्ष बाद, ईश्वर ने उन्हें मुक्त कराने और उन्हें उसी भूमि पर वापस लाने के लिए मूसा को भेजा जिस भूमि का वचन ईश्वर ने उनके पूर्वजों को दिया था। रास्ते में सिनाई पर्वत पर मूसा ने ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए इंसानों और सृष्टिकर्ता के बीच एक करार करवाया।
ईश्वर ने इंसानों से कहा कि वे धर्मोपदेशकों और पवित्र लोगों का राष्ट्र होंगे। पुरुष और स्त्रियां, नेता और मजदूर, सभी इंसान सिनाई पर्वत की तराई में खड़े रहे। उनमें से हरेक ने ईश्वर की आवाज को सीधे उन सभी से बात करते सुना, जो उन्हें इस करार के 10 बुनियादी नियम बता रही थी। इसके बाद ईश्वर ने उन शब्दों को नीलम की दो तख्तियों पर उकेर दिया।
सिनाई मरुस्थल में 40 वर्ष के समय के दौरान ईश्वर ने मूसा को कई कायदे-कानून सिखाए। मूसा को ईश्वर ने जो कुछ सिखाया वे उसे लोगों को सिखाते और समझाते थे। लोगों से कहा गया कि वे उन कायदे-कानूनों पर चर्चा करें और अपने बच्चो को भी सिखायें। मूसा ने ईश्वर की बताई सभी बातें पाँच पुस्तकों में लिख दीं। 40 वर्षों की समाप्ति पर, सभी से उन पुस्तकों की अपनी-अपनी प्रतियां बनाने और उनका अध्ययन करने को कहा गया। मूसा की लिखी इन पाँच पुस्तकों और मौखिक रूप से बताए गए अलिखित कायदे-कानूनों और उनकी व्याख्याओं को एक साथ मिलाकर तोरा कहा जाता है जिसका अर्थ है “शिक्षा” या उपदेश।
तोराका करार ने एक समाज की स्थापना की जो कई प्रकार से उस समय के अन्य समाजों से बिल्कुल अलग था। जैसे कि नियम-कायदे निरपेक्ष थे - न केवल लोगों के नेतृत्वकर्ता, बल्कि स्वयं ईश्वर भी नियम-कायदों के करार से बंधे थे। प्रत्येक बच्चे को इन नियम-कायदों की शिक्षा देना आवश्यक था। कानूनी समानता ने सभी नागरिकों को बराबर स्थिति में ला खड़ा किया। इसके अलावा, समाज के सभी लोग एक-दूसरे के कल्याण के लिए उत्तरदायी हो गए। और ईश्वर के संबंध में यह समझा जाता था कि वह उसे पुकारने वाले सभी लोगों के लिए समान रूप से सुलभ व सुगम्य है - विशेष रूप से पीड़ितों और कुचले हुए लोगों के लिए।
इस करार को कभी बंद नहीं किया गया। किसी प्रमाणित यहूदी न्यायधिकरण अदालत के समक्ष जो भी व्यक्ति इसकी सभी आवश्यकताओं को स्वीकार कर लेता है, उसे यहूदी मान लिया जाता है। पर अच्छा इंसान बनने के लिए यहूदी बनना आवश्यक नहीं है। इब्राहीम से पहले आने वाले नूह का करार समस्त मानवजाति के लिए साझा नागरिक नियम-कायदों का एक समूह है।
मूसा के बाद कई पैगम्बर हुए जिन्होंने लोगों को तोरा को कायम रखने के लिए प्रेरित भी किया और मलामत भी की। इनमें से कई पैगम्बरों के कहे शब्द हिब्रू बाइबल की 24 पुस्तकों में लिखे हुए हैं। बाइबल की पारंपरिक व्याख्या और विस्तार के काफ़ी बड़े हिस्से को बाद में, मिशना और तल्मूद में लिखा गया।
करार होने के बाद से जितना समय गुजरा है, उसमें यहूदियों को उनके देश से दो बार निकाला जा चुका है और वे विश्व के लगभग हर स्थान पर बस चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार, आज विश्वभर में लगभग 1.50 करोड़ यहूदी फैले हुए हैं। ईश्वर उन्हें जहां भी ले गया है, हर स्थान पर उन्होंने फिर से अपने तोरा का सहारा लिया है और यह खोजा है कि वह हर परिस्थिति में किस प्रकार लागू होता है।
हिब्रू बाइबल और उसके पैगम्बरों - नूह, इब्राहीम, मूसा, दाऊद, सुलेमान, यशायाह और कई अन्य - को स्वीकार करने वाले अन्य धर्म भी उत्पन्न हुए। पर यहूदियों ने हिब्रू बाइबल और ईश्वर के साथ हुए अपने मूल करार के रास्ते पर बिना डिगे चलना जारी रखा है।
प्राचीन फारसियों, यूनानियों और रूमियों से लेकर अरबों और यूरोपीय लोगों तक, महान राष्ट्रों और साम्राज्यों ने धीरे-धीरे बहुत से यहूदी नियम-कायदों और मान्यताओं को अपनाया है। इस समय तक, संपूर्ण विश्व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तोरा के उपदेशों द्वारा रूपांतरित हो चुका है। तोरा ने विश्व को जो बुनियादी मान्यताएं दीं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
- हम सभी केवल एक ईश्वर के प्रति जवाबदेह हैं जो हमसे न्याय और दया की मांग करता है।
- यह विश्व वस्तुतः एक अच्छा स्थान है और जीवन का एक उद्देश्य होता है।
- हम पृथ्वी के खिदमतगार हैं जिन्हें उसकी देखभाल करने और उसे आदर्श बनाने के लिए यहां रखा गया है।
- मानव जीवन के मूल्य को किसी तराजू या पैमाने से मापा नहीं जा सकता है।
- ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति को अच्छे व बुरे में से एक को चुनने की शक्ति प्रदान करता है।
- प्रत्येक बच्चे को नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए।
- ईश्वर उनसे प्रेम करता है जो अपने स्वयं के परिश्रम से आजीविका कमाते हैं।
- सभी नागरिकों के पास उनकी संपत्ति के अधिकार हैं।
- व्यक्ति के अधिकार, राज्य की सत्ता से पहले आते हैं।
- कानून से ऊपर कोई प्राधिकारी नहीं है।
- हम सभी पर ज़रूरतमंदों की देखभाल करने की जिम्मेदारी है।
- हमें उनका सम्मान करना चाहिए जो हमसे अलग हैं और हमारे धर्म का पालन नहीं करते हैं।
- सभी राष्ट्रों को एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहना सीखना चाहिए।
यहूदी लोग, पैगम्बरों द्वारा वचन दिए गए समय के प्रति आशान्वित हैं, एक ऐसा समय जिसमें सारे यहूदी अपनी मातृभूमि लौटेंगे, पूरे विश्व में सामंजस्य होगा और समस्त मानवजाति का व्यवसाय, ईश्वर को जानना होगा। यह स्पष्ट है कि हम तेजी से एक ऐसे ही युग की ओर बढ़ रहे हैं। ईश्वर करे वह युग हमारी कल्पना से भी पहले साकार हो जाए।
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