यहूदी, इब्राहीम की संतानें हैं। इसलिए, उनके विश्वास क्या हैं यह समझने के लिए, हमें इस महान इंसान की कहानी से शुरूआत करनी होगी जो संभवतः पूरे विश्व के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति है।
इब्राहीम लगभग 4,000 वर्ष पहले प्राचीन मेसोपोटामिया में मानव सभ्यता के शुरूआती नगरों में से एक, उर में रहने वाले एक छोटे बच्चे थे। उनका परिवार और सभी पड़ोसी सितारों, सूर्य और चंद्रमा की तथा पत्थरों, धातु व लकड़ी से बनी मूर्तियों की पूजा करते थे। वे अपने राजा के चित्रों की पूजा करते थे और उसे ही ईश्वर मानते थे। नन्हे इब्राहीम मासूम थे तो वे भी उनके साथ-साथ पूजा किया करते थे।
पर छोटी आयु में ही, इब्राहीम के मन में इन सभी देवी-देवताओं के प्रति शंकाएं उत्पन्न होने लगी थीं। उन्होंने देखा कि पवन, वर्षा, सूर्य और चंद्रमा एकसाथ एक चमत्कारिक तालमेल में कार्य करते थे। रात के आकाश में सितारों के बीच एक व्यवस्था या एक क्रम दिखाई पड़ता था, बिल्कुल वैसे ही जैसे पृथ्वी पर पौधों और पशुओं के बीच था। अपने चारों ओर के विश्व और अपने जीवनकाल की घटनाओं का अवलोकन करने पर इब्राहीम को महसूस हुआ कि केवल एक ही ईश्वर है - वह सभी घटनाओं के पीछे का इकलौता बल है, वह संपूर्ण सृष्टि के पीछे की एकमात्र वास्तविकता है।
उन्होंने अपने आप से पूछा, “लोगों ने पत्थरों की मूर्तियों की पूजा करने के लिए स्वर्ग व पृथ्वी के एकमात्र ईश्वर को छोड़ कैसे दिया?”
इब्राहीम के समय से कई वर्ष पहले, सभी लोगों को एक ईश्वर के होने के बारे में जानकारी थी। पर उन्होंने आकाश में अन्य महान शक्तियां भी देखीं। उन्हें लगा कि यदि ईश्वर ने इन्हें इतनी शक्ति दी है, तो इन्हें भी सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने ईश्वर के प्रभुत्व से इनकार नहीं किया। उन्होंने सोचा कि वे ईश्वर की इच्छा से ही इन अन्य शक्तियों की पूजा करते हैं।
इन प्राचीन लोगों में कुछ बुद्धिमान लोग भी थे जिन्होंने यह निर्धारित किया कि प्रकट होने, बदलने और समय के साथ मिट जाने वाली सभी वस्तुओं के पीछे केवल एक, बुलंद ईश्वर है। उन्होंने सोचा कि निश्चय ही ऐसे सर्वोच्च और दोषहीन ईश्वर को हाड़ - मांस के शरीरों में बंधे इंसानों की तुच्छ गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने इंसानों की रोज़मर्रा की चिंताओं और सरोकारों को ईश्वर से नीचे की शक्तियों का अधिकारक्षेत्र मान लिया, जो उनकी पहुंच में थीं और उनकी पूजा पर प्रतिक्रिया देतीं।
धीरे-धीरे, छद्म पैगंबर पैदा होने लगे जिन्होंने लोगों को बताया कि कुछ फ़रिश्तों या सितारों ने उनसे बात की और उन्होंने यह घोषणा कर दी कि उन्हें कुछ निश्चित तरीकों से पूजा जाना चाहिए। पैगंबरों ने मंदिर तथा उन शक्तियों को निरूपित करने वाली साकार मूर्तियां बनाईं। उन्होंने लोगों को सिखाया कि यदि वे किसी खास मूर्ति की पूजा करेंगे और एक विशेष अनुष्ठान करेंगे तो वे लाभान्वित व सफल होंगे और दंड के भागी नहीं बनेंगे।
आरंभ में बुद्धिमान लोग इन शक्तियों की असलियत जानते थे पर बाद में वे भी झूठी बातों के जाल में फंस गए। आखिर हुआ यह कि एक ईश्वर को लगभग पूरी तरह भुला दिया गया। आम लोग केवल लकड़ी और पत्थरों की मूर्तियों को ही जानते थे जिनके सामने वे सिर झुकाते थे और अपनी युवावस्था से ही बलि देते थे। साथ ही वे उन शक्तिसंपन्न व्यक्तियों के आगे नतमस्तक थे जिन्होंने यह मांग की थी कि उन्हें भी पूजा जाना चाहिए। केवल कुछ श्रेष्ठ व्यक्तियों ने सत्य को कायम रखा था, पर इन व्यक्तियों की बातें बहुत कम लोग सुनते थे।
पर इब्राहीम ने इन सभी चीजों के पार देखा। उन्हें समझ में आया कि यदि ईश्वर वास्तव में केवल एक है तो उसके लिए स्वर्ग व पृथ्वी, बड़े व छोटे के बीच में कोई अंतर नहीं है। और ईश्वर द्वारा इस विशाल और सामंजस्यपूर्ण विश्व का संधारण करने के लिए यह आवश्यक है कि वह हर घटना में उपस्थित हो और हर जीवन से उसका सरोकार हो। साथ ही यह भी सही है कि इंसान को न्याय और करुणा को अपनाकर ईश्वर के साथ सामंजस्य के साथ रहने, या फिर अंधकार, भ्रष्टाचार, हिंसा और पाप के मार्ग पर पतित होने में से किसी एक को चुनने की स्वाधीनता प्राप्त है।
इब्राहीम को समझ में आया कि मूर्ति पूजा ही सत्य को छिपा रही थी। चूंकि इंसान किसी एक ईश्वर के प्रति जवाबदेह नहीं थे, तो वे अनैतिकता की गहराइयों में पतित हो चुके थे, अपने खुद के बच्चों की बलि दे रहे थे, चोरी-चकारी, बलात्कार और हत्याओं को सही ठहरा रहे थे।
इसलिए, इब्राहीम ने अपने पिता के घर में सभी मूर्तियों को चूर-चूर कर दिया। उन्होंने लोगों को यह समझाना शुरू कर दिया कि उन्हें स्वर्ग व पृथ्वी के केवल एक ईश्वर को पूजना चाहिए जो सर्वव्यापी है और सभी के लिए सुगम्य है। उन्होंने लोगों को सिखाया कि उस एक ईश्वर के मन में अपने बनाए सभी प्राणियों के लिए दया है और वह सभी से ईमानदारी और न्याय की मांग करता है। इब्राहीम के उपदेश तेजी से फैलते गए और अधिकांश विश्व ने उन्हें स्वीकार लिया।
जब इब्राहीम ने स्वयं के बूते इस सत्य की खोज कर ली, तो ईश्वर स्वयं उनके समक्ष प्रकट हुए और उन्हें इस ज्ञान के प्रसार का कार्य सौंप दिया। ईश्वर ने इब्राहीम को वचन दिया कि वे बहुत सी कौमों के पिता होंगे।
इब्राहीम ने ईश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गए कार्य को अपने पुत्र इसाक को सौंप दिया जिन्होंने उसे अपने पुत्र याकूब को दिया। याकूब ने अपने 12 पुत्रों को सिखाया। पर याकूब और उनके पुत्रों को मिस्र जाना पड़ा जहां उनकी संतानों को दास बना लिया गया। मिस्र में, इब्राहीम के रोपे सभी ज्ञान-वृक्ष मुरझा गए और उन्होंने ज्ञान की जो मशाल जलाई थी वह लगभग बुझने की स्थिति में जा पहुंची।
पर इब्राहीम के प्रति अपने प्रेम और उनको दिए गए वचन के कारण, ईश्वर ने मिस्र से लोगों को छुड़ाने के लिए मूसा को भेजा। मूसा सभी पैगंबरों से महान थे। वे लोगों को सिनाई लेकर आए, जहां उन्होंने सीधे ईश्वर की वाणी सुनी, जो उन्हें कोई भी मूर्ति न रखने और स्वर्ग व पृथ्वी के एकमात्र रचयिता के अलावा अन्य किसी शक्ति की पूजा न करने का आदेश दिया । क्योंकि उसके अलावा संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई भी शक्ति या बल है ही नहीं।
मूसा ने लोगों को याद दिलाया कि जब उन्होंने सिनाई पर्वत पर ईश्वर की वाणी सुनी थी तो उन्हें कोई छवि दिखाई नहीं दी थी। मूसा ने उन्हें रोज़ाना दो बार यह बोलने को कहा: “सुनो हे इसराइल, ईश्वर हमारा ईश्वर है, ईश्वर एक है।”
जब हम कहते हैं कि “ईश्वर एक है,” तो हमारा अर्थ केवल इतना नहीं होता कि केवल एक ही ईश्वर है। हमारा यह मतलब भी होता है कि उसके कोई अंग, कोई शरीर, कोई साकार रूप नहीं है और उसे न तो समझा जा सकता है और न ही किसी भी तरीके से परिभाषित किया जा सकता है।
उसके एकत्व के बाहर कुछ भी नहीं है। जैसा कि मूसा ने लोगों से कहा, “दिन के प्रकाश जितनी साफ यह बात जान लो कि ईश्वर ही एकमात्र शक्ति है। ऊपर आकाश में और नीचे पृथ्वी पर, और कुछ भी नहीं है।”
इतना ही नहीं कि कोई अन्य ईश्वर नहीं है बल्कि उनके अलावा कुछ भी नहीं है। जैसे कोई विचार स्वयं नहीं सोचता है, वैसे ही हमारी दुनिया में कुछ भी “केवल यहाँ” नहीं है, न ही वह इस क्षण इसलिए यहाँ है क्योंकि यह एक पल पहले यहाँ था। यह यहां हर पल केवल इसलिए है क्योंकि ईश्वर चाहता है कि यह फिर से यहां हो। यदि ऐसा है, तो हर चीज की असली वास्तविकता वह नहीं है जिसे हम देखते या छूते हैं, बल्कि ईश्वर की इच्छा है कि इसका अस्तित्व रहे।
और, यदि हम अचानक अपने इर्द-गिर्द के विश्व को गायब होता देखें, तब भी ईश्वर बने रहेंगे, बिलकुल अपरिवर्तित।
ईश्वर ही एकमात्र सच्ची वास्तविकता है, क्योंकि उसका अस्तित्व किसी भी अन्य वस्तु के अस्तित्व पर निर्भर नहीं है। और फिर भी उनकी इच्छा हर चीज में शामिल है और हमेशा उन्हें संधारण करता है।
जब हम कहते हैं कि ईश्वर एक है तो हमारा यही मतलब होता है: वह सर्वव्यापी है, हर वस्तु में विद्यमान है। वही वह एकत्व है जिसमें सारी वस्तुएं समाई हुई हैं। और फिर भी, वह उन सभी से परे है।
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